कविता

कोरोना काल की एक कविता
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तुम्हारे लिए लॉक डाउन उत्सव सरीखा था
तुमने खूब बनाये पकवान
और
बनाये लतीफ़े उस दौरान

जो सड़कों पर भटके
जिनके आँसू भी सबको खटके
फुटपाथों पर तरसे एक निवाले को
उसकी भरपाई कौन करेगा
क्या जीवन इस तरह मरेगा

राजा थे जो अपनी मरज़ी के
पल में हो गए रंक
हाथ फैलाये खड़े रहे जो
बाल लगाए अंक
उन बच्चों की भूख का
हरजाना कौन भरेगा
उसकी भरपाई कौन करेगा

घर लौटने की हाय मजबूरी
नाप डाली कदमों से दूरी
पैरों के छालों का ऋण किसका भाग्य गहेगा
क्या जीवन इस तरह मरेगा
उसकी भरपाई कौन करेगा

~राजविन्दर

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