अविरल धारा

भावों की अविरल धारा में
तुम बहते हो
प्राणों के आरोह अवरोह के
बाधित क्रम में 
तुम रहते हो
नयनों की दृष्टि जाती
जहाँ दूर क्षितिज पर
आसमान के तारों में
तुम दिखते हो
धवल चाँदनी में
नरम घास पर 
चँदा की उजली परछाई में
मेरे साये के साथ साथ 
तुम चलते हो


@राजविन्दर

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