एक भोजपत्र खोजूँगी और लिखूँगी उस पर तुम्हारा सब अनकहा बाँसुरी के खोल में भरूँगी वो सारी तुम्हारी साँसे जो भागदौड़ में उखड़ी हैं तुम्हारे सीने से बन जाएंगी वो मधुर संगीत जो सुनाई देगा हम दोनों को विपरीत पथों पर चलते ठेलते! @राजविन्दर
भावों की अविरल धारा में तुम बहते हो प्राणों के आरोह अवरोह के बाधित क्रम में तुम रहते हो नयनों की दृष्टि जाती जहाँ दूर क्षितिज पर आसमान के तारों में तुम दिखते हो धवल चाँदनी में नरम घास पर चँदा की उजली परछाई में मेरे साये के साथ साथ तुम चलते हो @राजविन्दर
हर स्त्री के हिस्से में आ सकता है पुरुष का साथ स्नेह प्रेम वात्सल्य किन्तु हर स्त्री के हिस्से नहीं आते पुरुष के आँसू अगर तुम्हारे काँधे पर गिरें उन आँसुओं की बूंदें ओ स्त्री! धन्य समझना स्वयं को क्योंकि केवल तू उन क्षणों की राजदार है उन मोतियों को अपने आँचल में सहेजना तुम्हारी जिम्मेदारी है ~राजविन्दर
तुम खो चुके हो हक मेरे छालों पर मरहम लगाने का भूल गए शायद तुम पर मैं नहीं याद है तुमने खींच कर मेरा हाथ रख दिया था गर्म स्याह तवे पर क्योंकि खो गई थी मैं स्मृतियों में रोटी पकाते हुए और जल गई थी वो रोटी जिसका तुम इंतजार कर रहे थे खाने की मेज पर उसके जलने का दर्द तुम सह नहीं पाए सोचती हूँ मेरे जलने का दर्द मेरी माँ कैसे सहेगी तुम खो चुके हो हक् मेरी आँखें से आँसू पोंछने का बस बात इतनी ही तो थी थोड़ी मिर्च ज्यादा थी दाल में जो बनाई थी तुम्हारे दोस्तों के लिए तुम आये तेजी से रसोईघर में और मुट्ठी भर मिर्च मेरी आँखों में फेंक दी वो मिर्च तब चुभती है और भी ज्यादा जब तुम चूमते हो मेरी पलकों को प्यार से तब आँसुओं के समन्दर में बह जाती हूँ मैं तुम खो चुके हो कह मेरे बालों में उंगलियाँ फिराने का कि अब जह्न में गुदगुदी जहीं होती कलेजा आता है मुँह को तुमने एक रोज खीचकर बालों से पटका था फर्श पर बात ही तो कर रही थी माँ से फोन पर सुन न पाई तुम्हारे आने की आहट केवल अधिकार ही है क्या तुम्हारा मुझ पर प्रेम और विश्वास भी तो होता है पति पत्नी में कैसे मान लूँ कि तुम मेरे परमेश्वर हो परमेश्वर तो दुःख हरता ...
कोरोना काल की एक कविता --------------------------------------- तुम्हारे लिए लॉक डाउन उत्सव सरीखा था तुमने खूब बनाये पकवान और बनाये लतीफ़े उस दौरान जो सड़कों पर भटके जिनके आँसू भी सबको खटके फुटपाथों पर तरसे एक निवाले को उसकी भरपाई कौन करेगा क्या जीवन इस तरह मरेगा राजा थे जो अपनी मरज़ी के पल में हो गए रंक हाथ फैलाये खड़े रहे जो बाल लगाए अंक उन बच्चों की भूख का हरजाना कौन भरेगा उसकी भरपाई कौन करेगा घर लौटने की हाय मजबूरी नाप डाली कदमों से दूरी पैरों के छालों का ऋण किसका भाग्य गहेगा क्या जीवन इस तरह मरेगा उसकी भरपाई कौन करेगा ~राजविन्दर