मुक्त हूँ मैं
तुम खो चुके हो हक
मेरे छालों पर मरहम लगाने का
भूल गए शायद तुम
पर मैं नहीं
याद है
तुमने खींच कर मेरा हाथ
रख दिया था
गर्म स्याह तवे पर
क्योंकि खो गई थी मैं स्मृतियों में
रोटी पकाते हुए
और जल गई थी वो रोटी
जिसका तुम इंतजार कर रहे थे
खाने की मेज पर
उसके जलने का दर्द
तुम सह नहीं पाए
सोचती हूँ मेरे जलने का दर्द
मेरी माँ कैसे सहेगी
तुम खो चुके हो हक्
मेरी आँखें से आँसू पोंछने का
बस बात इतनी ही तो थी
थोड़ी मिर्च ज्यादा थी
दाल में
जो बनाई थी तुम्हारे दोस्तों के लिए
तुम आये तेजी से रसोईघर में और मुट्ठी भर मिर्च
मेरी आँखों में फेंक दी
वो मिर्च तब
चुभती है और भी ज्यादा
जब तुम चूमते हो
मेरी पलकों को प्यार से
तब आँसुओं के समन्दर में बह जाती हूँ मैं
तुम खो चुके हो कह
मेरे बालों में उंगलियाँ फिराने का
कि अब जह्न में
गुदगुदी जहीं होती
कलेजा आता है मुँह को
तुमने एक रोज खीचकर
बालों से पटका था फर्श पर
बात ही तो कर रही थी माँ से फोन पर
सुन न पाई तुम्हारे आने की आहट
केवल अधिकार ही है क्या
तुम्हारा मुझ पर
प्रेम और विश्वास भी तो होता है
पति पत्नी में
कैसे मान लूँ कि तुम
मेरे परमेश्वर हो
परमेश्वर तो दुःख हरता है
छीनती हूँ आज से
तुमसे वो सारे अधिकार
जो दिए थे सात फेरों ने तूम्हें
कि आज से मुझ पर
तुम्हारा कोई अधिकार नहीं
आज से मुक्त हूँ मैं
आजाद हूँ आबाद हूँ !