कोरोना काल की एक कविता --------------------------------------- तुम्हारे लिए लॉक डाउन उत्सव सरीखा था तुमने खूब बनाये पकवान और बनाये लतीफ़े उस दौरान जो सड़कों पर भटके जिनके आँसू भी सबको खटके फुटपाथों पर तरसे एक निवाले को उसकी भरपाई कौन करेगा क्या जीवन इस तरह मरेगा राजा थे जो अपनी मरज़ी के पल में हो गए रंक हाथ फैलाये खड़े रहे जो बाल लगाए अंक उन बच्चों की भूख का हरजाना कौन भरेगा उसकी भरपाई कौन करेगा घर लौटने की हाय मजबूरी नाप डाली कदमों से दूरी पैरों के छालों का ऋण किसका भाग्य गहेगा क्या जीवन इस तरह मरेगा उसकी भरपाई कौन करेगा ~राजविन्दर
हर स्त्री के हिस्से में आ सकता है पुरुष का साथ स्नेह प्रेम वात्सल्य किन्तु हर स्त्री के हिस्से नहीं आते पुरुष के आँसू अगर तुम्हारे काँधे पर गिरें उन आँसुओं की बूंदें ओ स्त्री! धन्य समझना स्वयं को क्योंकि केवल तू उन क्षणों की राजदार है उन मोतियों को अपने आँचल में सहेजना तुम्हारी जिम्मेदारी है ~राजविन्दर
भावों की अविरल धारा में तुम बहते हो प्राणों के आरोह अवरोह के बाधित क्रम में तुम रहते हो नयनों की दृष्टि जाती जहाँ दूर क्षितिज पर आसमान के तारों में तुम दिखते हो धवल चाँदनी में नरम घास पर चँदा की उजली परछाई में मेरे साये के साथ साथ तुम चलते हो @राजविन्दर